27 नवंबर 2020

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शुक्र पूजन

शुक्र पूजन

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वैदिक विधान के अनुसार भगवान शुक्र की कृपा प्राप्ति हेतु शुक्र पूजन किया जाता है।सभी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु शुक्र पूजन कराना चाहिए।

सामान्य परिचय -फ़लित ज्योतिष में बृहस्पति के समान शुक्र को भी नैसर्गिक शुभ ग्रह माना गया है साथ ही शुक्र को दैत्यगुरु की संज्ञा दी जाती है।ब्राह्मण वर्ण,रजो गुण,वात-कफ प्रकृति है,स्त्री कारक ग्रह है।जल तत्व,शरीरस्थ सप्त धातु में यह वीर्य का कारक ग्रह है।संसार की जितनी भी आमोद-प्रमोद, भोग विलास की वस्तुएँ है उन सब का कारक शुक्र ग्रह है।कुंडली में शुक्र की अशुभ स्थिति में जीवन से प्रेम-सुख-भोग-विलाश ख़त्म हो जाते है,खास कर इसके अशुभ प्रभाव प्रेम सम्बन्ध,विवाह बाँधा और दाम्पत्य जीवन पर पड़ते है,शुक्र के अशुभ योग से शरीर में वर्य की कमी से शारीरिक सम्बन्धित परेशानी बन जाती है।शुक्र अशुभ स्थिति में कला,अभिनय,साज-सज्जा,रत्न,फल विक्रेता,वस्त्र विक्रेता,रचना कार,शिल्पकार,राजनेता,धर्म,फिल्मजगत आदि के कार्यो में संलग्न व्यक्तियों को खासा परेशन करता है।

क्यों  करे शुक्र का पूजन -शुक्र पूजन से जीवन में शुभता बढ़ती है।घर-परिवार में सम्बन्ध मधुर होते है,प्रेम सम्बन्ध ,दांपत्य जीवन में सुख मिलता है,शारीरिक कमजोरी ख़त्म होती है।इस लिए शुक्र पूजन करना लाभदायक होता है।

शुक्र पूजन  के प्रकार -वस्तुत शुक्र का पूजन सभी विशेष पर्व में करते है,या किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु करते है,परन्तु विशेष प्रकार के पूजन व् मन्त्र-जाप-पाठ-हवन हमारे द्वारा दिशा निर्देश किये जाते है।

शुक्र पूजन  के लाभ-
शुक्र पूजन से जीवन में सम्बन्ध मधुर होते है व् सुख में वृद्धि होती है।
जीवन में बढ़ रही परेशानिया समापत होती है।
शुक्र पूजन से व्यापर नौकरी में सफलता मिलती है।
शुक्र पूजन से शुक्र के शुभ प्रभाव मिलते है और प्रेम व् दांपत्य जीवन सुखमय रहता है ।

कैसे किया जाता है पूजन

हमारे वैदिक आचार्यों द्वारा पूजन वैदिक रीति अनुसार किया जाता है,जिसके फल स्वरूप व्यक्ति विशेष की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती है।

वैदिक पूजन प्रक्रिया

1-मंगलाचरण -सर्व प्रथम पूजन प्रारम्भ हेतु सभी गुरुओं,देवी-देवता,इष्ट देव,पितरों आदि का वंदन मंगलकामना हेतु किया जाता है।

2-संकल्प -संकल्प पूजन का विशेष अंग होता है,इसके द्वारा यजमान के नाम,गोत्र,वर्ण काल आदि की स्थिति को बताया जाता है,पूजन का उद्देश्य व व्यक्ति की मनोकामनाओं को संकल्प द्वारा सिद्ध किया जाता है।

3-स्वस्ति वाचन -मंगलकामना हेतु वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।

4-गणेश पूजन -पूजन मण्डल व यज्ञ की निर्विघ्नता हेतु भगवान गणेश का पूजन व स्थापन किया जाता है,भगवान गणेश के आशीर्वाद से पूजन व यज्ञ का पूर्ण फल यजमान को प्राप्त होता है।

5-कलश पूजन -किसी भी पूजन व यज्ञ में कलश पूजा का विशेष महत्व है।कलश पूजन सुख-समृद्धि के साथ यज्ञ की पूर्णता का प्रतीक है।

6-पंचांग पीठ पूजन -गणेश पूजन के उपरांत पंचांग पीठ पूजन का विधान है।पंचांग पीठ में ब्रह्मा,विष्णु,महेश पूजन,मातृका पूजन आदि किया जाता है।

7-पुण्याहवाचन – पुण्यहवाचन अर्थात पुण्यवचन।पूजन व यज्ञ मे सम्पूर्ण फल की प्राप्ति हेतु पुण्यवचनो द्वारा यजमान के लिए प्रार्थना की जाती है।

8-नवग्रह पूजन – नव ग्रह अर्थात (सूर्य,चंद्र,मंगल,बुध,बृहस्पति,शुक्र,शनि,राहु,केतु) का आवहन स्थापन व पूजन ग्रह कृत बाँधा दूर करने हेतु किया जाता है व पूजन व यज्ञ द्वारा ग्रहो के शुभ फल की  प्राप्ती हेतु प्रार्थना की जाती है।

9-दिक्पाल,लोकपाल व क्षेत्रपाल पूजन -वैदिक परम्परा अनुसार चार दिशाएँ,चार उपदिशाए,आकाश,पाताल व क्षेत्र के देवता का आवहन पूजन व स्थापन निर्विघ्नता हेतु किया जाता है।

10-प्रधान देव पूजन या सर्वतो भद्र पूजान -इस पूजन में यज्ञ के प्रधान देव का विशेष प्रकार से आवहन,स्थापन व पूजन किया जाता है।

11-मंत्र-जाप– पूजन उपरान्त मंत्रों का जाप किया जाता है।

12- हवन -मंत्र व पूजन की पूर्णता हेतु अंत में दशांश हवन जाप मंत्रो द्वारा ही किया जाता है।

13-आरती -भगवान की प्रसन्नता हेतु आरती की जाती है।

14-तर्पण और मार्जन -तर्पण व मार्जन करने से पूजन व यज्ञ में अज्ञानता वश किए गए दोष की शांति की जाती है।

15- ब्राह्मण भोज -पूजन व यज्ञ की समाप्ति हेतु ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाता है व श्रद्धा-भक्ति से भोजन कराया जाता है,यह भी पुण्य फल प्राप्ति हेतु पूजन प्रक्रिया के अंतर्गत आता है।

16-प्रसाद -अंत में सभी मनोकामनाओं व पुण्य फल की प्राप्ति हेतु ब्राह्मण व आचार्यों द्वारा आशीर्वाद हेतु आपको प्रसाद भेजा जाएगा।

1-वीडियो की सुविधा -विडियो व ओडीयो कोल के माध्यम से आप पूजन प्रक्रिया से जुड़ सकते है,आपके निमित्त किया गया सम्पूर्ण पूजन  विडियो के माध्यम से आपके ई-मेल व्हटसऐप नंबर पर भी उपलब्ध कराया जाता है।

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