29 नवंबर 2020

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पुखराज

पुखराज

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तौल :

10.380

रंग :

पीला

आकृति और कट :

मिश्रित कटिंग

पुखराज एक प्रकृतिक रत्न है।यह सफ़ेद व पीले रंग का मिलता है।यह रत्न देखने में बहुत आकर्षक होता है।

सामान्य परिचय– पुखराज को बृहस्पति ग्रह की शुभता के लिए धारण किया जाता है।पुखराज को धारण करने से शारीरिक व मानसिक रोग शांत होते है,शरीर में प्राण ऊर्जा बड़ती है,ज्ञान व बुद्धि प्रखर होती है।पुखराज को धारण करने से व्यक्ति की वाणी,चर्बी,मोटापा,मधुमेह,ज्वर,पीलिया,अतिसर सम्बंधी विकार नष्ट होते है।
पुखराज धारण करने से व्यवसाय,नौकरी दाम्पत्य व विधा,में आ रही बाँधा समाप्त होती है।        
पुखराज के शुभ प्रभाव से व्यक्ति को विशेष कर प्रसिद्धि,सम्मान,सफलता,शारीरिक व आर्थिक लाभ मिलते है।
पुखराज को शिक्षक,वक़ील,राजनेता,अभिनेता,चिकित्सक,उच्चाधिकारी,कला-साहित्य आदि से जुड़े व्यक्ति पहनना पसंद करते है।
पुखराज को मेष लग्न, कर्क लग्न,सिंह लग्न ,वृश्चिक लग्न,मीन लग्न वाले व्यक्ति को धारण करना चाहिए।पुखराज  दुष्ट आत्माओं, जादू-टोना और बुरे स्वप्नों से भी बचाता है।

भार व धातु-पुखराज को शरीर के वजन के  अनुसार धारण करना चाहिए या काम से काम 6 रत्ती या उस से अधिक धारण करना चाहिए।साथ ही पुखराज को सोने व चाँदी की अंगूठी पर धारण करना चाहिए।

पहनने का समय-पुखराज रत्न चंद्र मॉस की  शुक्ल पक्ष में किसी भी गुरूवार के दिन सूर्योदय के एक घंटे बाद धारण किया जाता है।

प्राण-प्रतिष्ठा-पुखराज को सोमवार की रात्रि में कच्चे दूध में या गंगा जल में रखना चाहिए और प्रातः काल में  भगवान विष्णु जी का आवाहन करे प्रार्थना करे।पुखराज को साफ जल से धोकर,लाल चन्दन लगाए,अक्षत चढ़ाये,धुप,दीप दिखाए और भगवान विष्णु से शुभता के लिए प्रार्थना करे।

मन्त्र-पुखराज की प्राण-प्रतिष्ठा के पश्चात पुखराज धारण करने के लिए सर्व प्रथम निम्नलिखित मन्त्र  का 108 बार जाप करें-

मन्त्र वैदिक-ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।।

मन्त्र तांत्रिक-ॐ बृं बृहस्पतये नमः

मन्त्र बीज-ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः

अंगुली – मन्त्र-जाप के बाद पुखराज की अंगूठी को दाहिने हाथ की तर्जनी (इंडेक्स फिंगर) अनुगली में धारण करना चाहिए।

विकल्प– पुखराज पुखराज के स्थान पर पीला मोती, पीला जिरकॉन,पीली
तूरमली, टोपाज़ और सिट्रीन (क्वाट्जर्टोपाज़) जैसे विभन्न विकल्प रत्न भी उपयोग में लाये जा सकते हैं।

सावधानी-ध्यान रहें की  पुखराज को हीरे, नीलम, गोमेद और
लहसुनिया के साथ नहीं पहना जाना चाहिए।

उत्पत्ति-सभी रत्न वस्तुतः खानो से प्राप्त होते है।पुखराज की प्राप्ति बर्मा (म्यांमार), श्रीलंका (सिलोन), भारत, मेडागास्कर और तंजानिया की पुखराज खानों से होती है।

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