28 अक्टूबर 2020

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चन्द्र पूजन

चन्द्र पूजन

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वैदिक विधान के अनुसार भगवान चंद्र की कृपा प्राप्ति हेतु चंद्र पूजन किया जाता है।सभी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु चंद्र पूजन कराना  चाहिए।

सामान्य परिचय-हमारी ग्रहमाला में सूर्य के पश्चात दूसरा सबसे महत्वपूर्ण ग्रह चन्द्रमा है।पुराणों के अनुसार महर्षि अत्रि की पत्नी अनुसूया के गर्भ से प्रजापति ब्रह्माजी के तेज के द्वारा चंद्रमा का जन्म हुआ था इनसे ही आगे चल कर चंद्रवंश चला।इसी वंश में भगवान् श्री कृष्ण का जन्म हुआ था।
भारतीय ज्योतिष शास्त्र के आधार पर चंद्र का वर्ण श्वेत या शुभ्र वर्ण के सामान है। इनकी अवस्था सुंदर युवक -युवती के सामान है।स्त्री ग्रह,चंद्र स्वभाव से जलतत्व तथा चंचल प्रकृति के ग्रह है।यह कालपुरुष में मन के कारक हैं,व्यक्ति के जीवन में इनके अशुभ प्रभाव से मानसिक परेशानी,मातृ कष्ट,हृदय रोग,रक्त विकार,जल सम्बंधित या तरल पदार्थ सम्बंधित व्यवसाय करने वालों को नुक़सान होता हैं।

क्यों  करे नज़र दोष पूजन
चंद्रमा के अशुभ प्रभावों को शान्त करने हेतु चंद्रमा का पूजन किया जाता हैं,चंद्रमा के पूजन से व्यक्ति के जीवन में शीघ्र शुभ प्रभाव देखने को मिलते हैं,और इनके आशीर्वाद से व्यक्ति के जीवन में शुभ फल,सुख,समृद्धि मिलती हैं।

चंद्र पूजन के प्रकार-चंद्र पूजन सभी विशेष तिथि,पर्व, त्योहार में करते है,या किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु करते है,परन्तु विशेष प्रकार के पूजन व् मन्त्र-जाप-पाठ-हवन हमारे द्वारा दिशा निर्देश किये जाते है।

चंद्र पूजन के लाभ-
चंद्र पूजन करने से चंद्र ग्रह के अशुभ प्रभावों से बचा जा सकता हैं तथा शुभ फल की प्राप्ति होती है।यह पूजन विशेष लाभ को देता हैं,मातृ सुख में वृद्धि करता हैं,मन को शीतल करता हैं।
व्यक्ति के ऊपर आयी परेशानियों को शान्त करता हैं,नौकरी और व्यवसाय में सफलता देता हैं।
चंद्र ग्रह के शुभ प्रभावों को देता हैं और जीवन को सुखमय बनाता हैं।

कैसे किया जाता है पूजन

हमारे वैदिक आचार्यों द्वारा पूजन वैदिक रीति अनुसार किया जाता है,जिसके फल स्वरूप व्यक्ति विशेष की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती है।

वैदिक पूजन प्रक्रिया

1-मंगलाचरण-सर्व प्रथम पूजन प्रारम्भ हेतु सभी गुरुओं,देवी-देवता,इष्ट देव,पितरों आदि का वंदन मंगलकामना हेतु किया जाता है।

2-संकल्प-संकल्प पूजन का विशेष अंग होता है,इसके द्वारा यजमान के नाम,गोत्र,वर्ण काल आदि की स्थिति को बताया जाता है,पूजन का उद्देश्य व व्यक्ति की मनोकामनाओं को संकल्प द्वारा सिद्ध किया जाता है।

3-स्वस्ति वाचन-मंगलकामना हेतु वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।

4-गणेश पूजन-पूजन मण्डल व यज्ञ की निर्विघ्नता हेतु भगवान गणेश का पूजन व स्थापन किया जाता है,भगवान गणेश के आशीर्वाद से पूजन व यज्ञ का पूर्ण फल यजमान को प्राप्त होता है।

5-कलश पूजन-किसी भी पूजन व यज्ञ में कलश पूजा का विशेष महत्व है।कलश पूजन सुख-समृद्धि के साथ यज्ञ की पूर्णता का प्रतीक है।

6-पंचांग पीठ पूजन-गणेश पूजन के उपरांत पंचांग पीठ पूजन का विधान है।पंचांग पीठ में ब्रह्मा,विष्णु,महेश पूजन,मातृका पूजन आदि किया जाता है।

7-पुण्याहवाचन– पुण्यहवाचन अर्थात पुण्यवचन।पूजन व यज्ञ मे सम्पूर्ण फल की प्राप्ति हेतु पुण्यवचनो द्वारा यजमान के लिए प्रार्थना की जाती है।

8-नवग्रह पूजन– नव ग्रह अर्थात (सूर्य,चंद्र,मंगल,बुध,बृहस्पति,शुक्र,शनि,राहु,केतु) का आवहन स्थापन व पूजन ग्रह कृत बाँधा दूर करने हेतु किया जाता है व पूजन व यज्ञ द्वारा ग्रहो के शुभ फल की  प्राप्ती हेतु प्रार्थना की जाती है।

9-दिक्पाल,लोकपाल व क्षेत्रपाल पूजन-वैदिक परम्परा अनुसार चार दिशाएँ,चार उपदिशाए,आकाश,पाताल व क्षेत्र के देवता का आवहन पूजन व स्थापन निर्विघ्नता हेतु किया जाता है।

10-प्रधान देव पूजन या सर्वतो भद्र पूजान-इस पूजन में यज्ञ के प्रधान देव का विशेष प्रकार से आवहन,स्थापन व पूजन किया जाता है।

11-मंत्र-जाप– पूजन उपरान्त मंत्रों का जाप किया जाता है।

12- हवन-मंत्र व पूजन की पूर्णता हेतु अंत में दशांश हवन जाप मंत्रो द्वारा ही किया जाता है।

13-आरती-भगवान की प्रसन्नता हेतु आरती की जाती है।

14-तर्पण और मार्जन-तर्पण व मार्जन करने से पूजन व यज्ञ में अज्ञानता वश किए गए दोष की शांति की जाती है।

15- ब्राह्मण भोज-पूजन व यज्ञ की समाप्ति हेतु ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाता है व श्रद्धा-भक्ति से भोजन कराया जाता है,यह भी पुण्य फल प्राप्ति हेतु पूजन प्रक्रिया के अंतर्गत आता है।

16-प्रसाद -अंत में सभी मनोकामनाओं व पुण्य फल की प्राप्ति हेतु ब्राह्मण व आचार्यों द्वारा आशीर्वाद हेतु आपको प्रसाद भेजा जाएगा।

17-वीडियो की सुविधा-विडियो व ओडीयो कोल के माध्यम से आप पूजन प्रक्रिया से जुड़ सकते है,आपके निमित्त किया गया सम्पूर्ण पूजन  विडियो के माध्यम से आपके ई-मेल व्हटसऐप नंबर पर भी उपलब्ध कराया जाता है।

 

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