28 मार्च 2020

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ग्रह विचार

द्वारा आचार्य पंकज जी

सूर्य – सूर्यों नृपो न चतुरस्रमघ्यमदिनेन्द्रदिक् स्वर्णचतष्पदोग्र:। सत्वं स्थिरस्तिक्तपशुक्षितिस्तु पितं जरन्पाटलमूलवन्य:।।सूर्य की भोगोलिक स्थिति-सूर्य खगोल की दृष्टि से पृथ्वी के सबसे निकट का तारा है,जो स्वयं के प्रकाश से प्रकाशवान है,जबकि अन्य ग्रह इसी के प्रकाश से प्रकाशित है।इस अर्थ में यह ग्रह न होकर तारा है।परन्तु फ़लित ज्योतिष में इसकी गणना ग्रहो में की जाती है। पृथ्वी से सूर्य की मध्यम दूरी 9,26,57,209 मील है।यह गैस पिण्ड है।जिसका व्यास 8,64,000 मील है।पृथ्वी से इसका आयतन 13 लाख गुना है,परिणाम 3 लाख 33 हज़ार गुना बड़ा है।सूर्य का नाभिकीय तापमान 4,00,00,000 F अंश है।

ज्योतिष शास्त्र में सूर्य के गुणधर्म-
सूर्य सिंह राशि का स्वामी है।मेष राशि के 10 अंश पर परमोच्च ओर तुला राशि के 10 अंश पर परम नीच स्थान पर होता है।यह चंद्र,मंगल,गुरु को अपना मित्र मानता है,भारतीय ज्योतिष में सूर्य को आम तोर पर पाप ग्रह माना जाता है।ज्योतिष में आत्मा ओर पिता कारक सूर्य है।

ज्योतिष में इसका रूप,रंग,आकर,प्रकार इस प्रकार है-
मधु पिंगल नेत्र,चतुस्त्र देह,शुचि,पित्त प्रकृति,बुद्धिमान,थोड़े केश वाला,पुरुष ग्रह,सुन्दर स्वरूप,गम्भीर स्वर,सम शरीर,शूर,प्रतापी,आत्मा,शक्ति,अग्नि,राज्य,हड्डी,आँख,शासन,पूर्व दिशा,ताँबा आदि का विचार करने में सूर्य का विचार किया जाता है,

सूर्य के कार्य क्षेत्र-
आधुनिक कारकत्वो में शासन वर्ग,प्रधानमंत्री,आई०ए०एस० अधिकारी,न्यायाधीश,हृदय रोग चिकित्सक,एटमिक एनर्जी,टेलिविज़न,रेडियो,सोशल ऐक्टिविटीज़,नेत्र चिकित्सा,आदि

चन्द्रमा

वैश्य: शशी स्त्री जलभूस्तपस्वी गौरोऽपराह्णाम्बुगधातुसत्त्वम्।
वायव्यदिक्श्लेष्मभुजंगरूप्यस्थूलो युवा क्षारशुभ:सितार:।।

चन्द्रमा की भोगोलिक स्थिति-

खगोल की दृष्टि से चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह है,किन्तु ज्योतिष में इसे भी ग्रह माना गया है।पृथ्वी से चन्द्रमा की मध्यम दूरी 238000 मील है।चन्द्रमा का व्यास 2160 मील है।यह 12 राशियों की एक परिक्रमा 27 दिन 7 घण्टे 43 मिनट में पूरी करता है।
ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमा के गुणधर्म-
चन्द्रमा का। शरीर स्थूल, युवा,कृश,श्वेत,वर्ण,काले केश,सुन्दर नेत्र,रक्त की प्रधानता,जल तत्व,मृदुवाणी,शरीर से भी मृदु(कोमल) है,यह स्थूल ओर कृश दोनो ही चन्द्रमा को कहा है।इसका भाव है शुक्ल पक्ष का स्थूल तथा  कृष्णपक्ष का कृश।
मानसिक स्थिति का विचार करने के लिए चंद्र को देखा जाता है।चंद्र मन ओर माता का  प्रमुख रूप से कारक है,ओर स्त्री ग्रह है।
चन्द्रमा चतुर्थ भाव का स्थिर कारक है।पृथ्वी के सबसे निकट होने के कारण चन्द्रमा का प्रभाव मनुष्य,वनस्पति,समुद्र ओर मोसम पर बहुत पड़ता है।भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा का लग्न के समान हीं महत्व है,

चन्द्रमा के कार्यक्षेत्र-
हर जलीय पदार्थ का विचार चन्द्रमा  से किया जाता है।आधुनिक कारकत्वो में तरल औषधियों,सिंचाई विभाग,आयात-निर्यात,डेरी फ़ार्म तथा मानसिक चिकित्सालय है।

मंगल

भौमस्तम: पित्तयुवोग्रवन्यो मघ्याह्नधातुर्यमदिक् चतुष्पात्।
ना राट् चतुष्कोणसुवर्णकारो दग्धाऽवनीव्यंगकटुश्च रक्त:।।

खगोल की दृष्टि से मंगल का स्वरूप
इस ग्रह की बहुत सी बातें पृथ्वी से मिलती जुलती है।पृथ्वी से इसकी मध्यम दूरी 48543000मील है।मंगल का भूमध्य व्यास 4219 है।ओर नाक्षत्रिक काल 687 दिन है।अर्थात् सूर्य की एक परिक्रमा 15 मील प्रति सेकेण्ड मध्यम गति से चल कर 687 दिन में पूरी करता है।

ज्योतिष शास्त्र में मंगल का स्वरूप-
ग्रहों में इसे सेनापति का दर्जा दिया गया है।इसकी जाति क्षत्रिय ओर युवावस्था बताई गयी है।यह शक्ति का प्रतीक है।नैसर्गिक पाप ग्रह माना गया है।इसका रंग लाल माना गया है।अग्नि तत्व का ग्रह है।वीरता,बल,शस्त्र,युद्ध,सम्बन्धी वस्तु का विचार मंगल से किया जाता है,यह सूर्य,चंद्र,गुरु को मित्र मानता है,शनि को सम ओर बुध को शत्रु मानता है।इसकी अपनी राशि मेष ओर वृश्चिक है,मकर के 28 अंश पर परमोच्च ओर कर्क के 28 अंश पर  परमनीचहोता है।दशम भाव में मंगल उच्च एवं दिग्बली होता है।मेष,कर्क,सिंह,धनु लग्न वालों के लिए शुभ मंगल होने पर शुभ फल देने वाला होता है।मंगल जहाँ बेठता है वहाँ से चतुर्थ,सप्तम,अष्टम में पूर्ण दृष्टि से देखता है।

मंगल ग्रह के कार्यक्षेत्र-
मंगल ग्रह सेना,रक्षाविभग,गुप्तविभाग,अस्त्र-शस्त्र,रेडियो,मैकेनिकल,मार्केटिंग,खेलजगत,मंत्रिमंडल,
ऊर्जविभाग,कम्प्यूटर,ड्राइविंग,टेलरिंग,सिनेमा जगत,भूमि क्रय-विक्रय,सट्टा,ब्रोकर,पेसो का लेन-देन,बिजली विभाग आदि कार्यक्षेत्र को देता है।

बुध

ग्राम्य: शुभो नीलसुवर्णवृत्त:शिक्ष्विष्टकोच्च:समधातुजीव:।श्मशानयोषोत्तरदिक्प्रभातं शुद्र:खग:सर्वरसो रजो ज्ञ:।।

बुध ग्रह की खगोलीय स्थिति
300 मील व्यास का यह सूर्य से सबसे निकट का ग्रह है।बुध की सूर्य से मध्यम दूरी 36,000,000 मील है।यह 88 दिन मेंसूर्य की परिक्रमा 29.8प्रति सेकेण्ड की गति से चल कर पूरी करता है।पृथ्वी से देखने पर यह सूर्य से 27 अंश से दूर कभी भी नही जाता।इसकी कक्षा (भ्रमणपथ) पृथ्वी की कक्षा से नीचे है।

ज्योतिष में बुध का स्वरूप-सुंदर देह,हास्य,प्रिया,मधुर भाषी,हरित वर्ण,स्पष्ट वक़्ता।इसे काल पुरुष की वाणी कहा गया है,यह पृथ्वी तत्व का ग्रह है,ओर सभी ग्रहो में इसका पद युवराज का है।यह मिथुन राशि व कन्या राशि का स्वामी है।कन्या राशि में 15 अंश तक परमोच्च,ओर मीन राशि में 15 अंश तक परमनीच में होता है।शुक्र ओर सूर्य को यह मित्र मंगल गुरु ओर शनि को सम ओर  चंद्र को शत्रु मानता है।
उत्तर दिशा का स्वामी है।त्वचा सम्बन्धी रोगों का कारक है।

बुध ग्रह के कार्य क्षेत्र-
बुध ग्रह हास्य,कवि,गायन,संगीतनृत्य,,खान-पान,वक़्ता,व्यापार,औषधि,वैध(Doctor),मंत्री मण्डल,समाज सेवा आदि कार्य क्षेत्र को देता है।

बृहस्पति

गुरू: प्रभाते नृशुभेशदिग् दिज: पीतो द्विपाद ग्राम्यसुवृत्तजीव:।
वाणिज्यमाधुर्यसुरालयेशो वृद्ध: सुरत्न समधातुसत्वम्।।

खगोल की दृष्टि से बृहस्पति का स्वरूप-

बृहस्पति (गुरु) सूर्य से 48,33,00,000 मील दूर है।ओर सौर मण्डल में सबसे बड़ा ग्रह है।मध्यरेखा पर इसका व्यास 88.700 मील है।8.1 मील प्रति सेकेण्ड की गति से 12 राशियों का भ्रमण 11.9 वर्ष में पूरा करता है।

ज्योतिष की दृष्टि से बृहस्पति का स्वरूप-

ज्योतिष में इसे देवगुरु कहा गया है,ब्राह्मणवर्ण,ज्ञान का कारक माना गया है।यह विशाल देह,पिंगल वर्ण के केश ओर नेत्र,कफ प्रकृति का कारक है।सर्वशास्त्रों का ज्ञाता,
पुष्ट छाती,वाणी सिंह या शंख की भाँति बतायी गयी है।यह सतोगुण,आकाश तत्व,पुरुष ग्रह,ईशान दिशा का स्वामी,चर्बी सम्बंधित रोग देता है।
गुरु की स्वराशि धनु ओर मीन है।कर्क राशि के पाँच अंश पर परमोच्च ओर मकर राशि के पाँच अंश पर परमनीच होता है।यह सूर्य,चंद्र,मंगल को मित्र बुध,शुक्र को शत्रु ओर शनि को सम मानता है।

बृहस्पति के कार्यक्षेत्र-
ज्ञान के स्थान,ब्राह्मण, ज्योतिषी,मंगल कार्य करने वाला,अध्यात्म,अध्ययन-अध्यापन,प्रधान मंत्री,मंत्री मण्डल,प्रशासन वर्ग,बेंक,क्लार्क,लेखक,वक़ील,न्यायाधीश,
व्यवस्थापक ,सुनार,फल-फूल-मिठाई विक्रेता,वक़्ता,समाचार,पत्रिका,आश्रम,मैरिज ब्यूरो आदि का कार्यक्षेत्र देता है।

शुक्र

शुक्र: शुभ: स्त्री जलगोऽपरह्ण:श्वेत:कफी रूप्यरजोऽम्लमूलम्।विप्रोऽग्निदिड़्मध्यवयो रतीशो जलावनीस्निग्धरूचिद्विपाच्च।।

खगोल की दृष्टि से शुक्र का स्वरूप-
इस ग्रह को सभी ने देखा होगा यह सूर्योदय के पूर्व या सूर्यास्त के बाद तीव्र धुति वाला पूर्वी ओर पश्चिमी आकाश में दिखता है।इसे प्रभात तारा ओर सन्ध्यातारा के नाम से जानते है।सूर्य से इसकी मध्यम दूरी 6,72,00,000 मीलप्रति सेकेण्ड की गति से 224.7 दिन में 12 राशियों का भ्रमण पूरा करता है।

ज्योतिष की दृष्टि से शुक्र का स्वरूप-
फ़लित ज्योतिष में गुरु  के समान शुक्र को भी नैसर्गिक शुभ ग्रह मानते है।साथ ही शुक्र हीं दैत्यगुरु की संज्ञा दी जाती है।ब्राह्मण वर्ण,राजस प्रकृति,स्त्री ग्रह है।यह जल तत्व का ग्रह है।शरीरस्थ सप्त धातु में यह वीर्य का कारक ग्रह है।संसार की जितनी भी आमोद-प्रमोद, भोग विलास की वस्तुएँ है उन सब का कारक शुक्र ग्रह है।शुक्र की स्वराशि वृषभ ओर तुला है।यह मीनराशि में 27 अंश पर परम उच्च ओर कन्याराशि में 27 अंश पर परमनीच का होता है।यह बुध,शनि को मित्र, सूर्य,चंद्र  को शत्रु ओर मंगल गुरु को सम मानता है।अग्नि दिशा का स्वामी है।

शुक्र ग्रह के कार्यक्षेत्र-
शुक्र ग्रह भोग विलास,साज-सजा,अभिनय,सौंदर्य,शेयर मार्केट,सेलून,परिधान,रेस्टोरेंट,सुगन्धित वस्तु,फूल,फल,देह व्यापार,आंतरिक गृह सज़ा,ज्योतिषी,एंकरिंग,कोल सेंटर,थोक विक्रेता आदि देने वाला होता है।

शनि

शनिर्विहंगाऽनिलवन्यसन्ध्याशूद्रांगनाधातुसम: स्थिरश्च।
क्रूर: प्रतीची तुवरोऽतिवृद्धोत्करक्षितीट् दीर्घसुनीललोहम्।।

खगोल की दृष्टि से शनि का स्वरूप-

नवग्रह कक्षा कर्म में यह सूर्य से सबसे दूर का ग्रह है।यह सूर्यसे 88 करोड़  61 लाख मील तथा पृथ्वी से 79 करोड़ 31 लाख 43 हज़ार मील दूर है।इसका व्यास 75100 मील है।6 मील प्रति सेकेण्ड की गति से अपनी कक्षा पर 29.5 वर्ष में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है।अपनी धुरी पर एक चक्र 10घण्टे 14 मिनट में पूरी कर लेता है।इसका द्रव्यमान पृथ्वी से 95 गुना ओर परिमाप 763 गुना है। पृथ्वी का घनत्व 5.5 है,जबकि इसका घनत्व 0.7 है  अर्थात यह पानी से हल्का है।शनि का सतहीं तापमान 2400F है।इसके चारों ओर सात वलय है।अंतरिक्ष यान वायजर द्वारा ज्ञात हुआ है कि शनि के 15 चन्द्रमा है,इनके से एक चन्द्रमा 3600 मीलव्यास का अर्थात् पृथ्वी से भी बड़ा है।

ज्योतिष की दृष्टि से शनि का स्वरूप-
फ़लित ज्योतिष में शनि को मंद,असित,सूर्य पुत्र ओर शनैश्चर कहते है।राशि चक्र में यह मकर ओर कुम्भ राशि का स्वामी है।तुला राशि में 20 अंश तक परमोच्च होता है तथा मेष राशि में 20 अंश तक परमनीच होता है।सूर्य के 9अंश निकट पहुँचने पर अस्त हो जाता है।इसका भाग्योदय वर्ष 36 है।वर्ण नीला है।पुष्य,अनुराधा ओर उत्तरा भद्रपदा इसके नक्षत्र है।मूलंक 8 है।रत्न नीलम है।शनि की गणना नैसर्गिक पाप ग्रह में की जाती है।
शरीर में वायु विकार ,कम्पन,हड्डी,दाँत के रोग का कारक है।ज्योतिष शास्त्र में इसे सर्वाधिक पाप ग्रह माना गया है।किन्तु वृषभ,तुला,मकर,कुम्भ लग्न वालों के लिए यदि उनकी कुंडली में शनि की स्थिति मज़बूत है तो यह योग कारक शुभफल देने वाला ग्रह हो जाता है।शनि की तृतीया,सप्तम,दशम दृष्टि है।

शनि ग्रह के कार्यक्षेत्र –

शनि ग्रह योगकारक स्थिति में राजकीय शासन,मंत्री पद,न्यायाधीश,उच्च अधिकारी,प्रशासनिक वर्ग,लोहे,चमड़ा,धातु,खनिज,गेस,पत्थर,कृषि,पशु,माँस उत्पादन,विदेशी आयात-निर्यात,नौकरशही,दलाल,साहूकार,ज़मींदार,परचूनी,शराब विक्रेता,सब्ज़ी विक्रेता,ठेकेदार आदि कार्यक्षेत्र देता है।

राहु-केतु

राहुस्वरूपं शनिवन्निषादजातिर्भुजंगोऽस्थिप नैऋतिश:।
केतु: शिखी तद्वदनेकरूप: खगस्वरूपात्फलमूह्यमित्थम्।।

खगोल में राहु केतु राहु-केतु का स्वरूप-

अभी तक आकाश मण्डल के सात दृश्यमान ग्रहो का वर्णन किया गया है।राहु-केतु आकाशीय पिण्ड नही है।बल्कि चन्द्रमा ओर क्रान्ति वृत के कटान बिंदु है।पौराणिक कथाओं में इन्हें असुर बताया गया है।पराशर मुनि ने इन्हें “तनों”अर्थात् अंधकारयुक्त ग्रह कहा है।भारतीय ज्योतिष शास्त्र में छाया ग्रह होते हुए भी इनके प्रभाव को बहुत महत्व दिया गया है।किन्तु कुछ बातों में दृश्यमान ग्रहों से अलग रखा गया है।जैसे दृश्यमान ग्रहो के नाम पर सप्ताह के सात दिन है इनके नाम पर कोई दिन नही है।

ज्योतिष की दृष्टि से राहु-केतु का स्वरूप-

राहु केतु को किसी राशि का स्वामित्व नही दिया गया।कुछ लोगों ने इनकी स्वराशि ओर उच्च राशि की कल्पना की है।कुछ विद्वान राहु की उच्च राशि वृष ओर मिथुन को मानते है।इसी प्रकार मूल त्रिकोण ओर नीच राशि की भी कल्पना की गयी है।अन्य दृश्यमान ग्रहोंकी दृष्टियाँ होती है।किंतु अंध ग्रह होने से इनकी कोई दृष्टि नही होती।
ये जिस-जिस भाव में बैठते है,पराशर के कथानुसार उसी प्रकार का फल देते है।प्रायः यह ग्रह जिस भाव में बैठता है।उसको किसी न किसी रूप से बिगाड़ते है।इन ग्रहो की गणना भी नैसर्गिक  पाप ग्रह में है,किंतु परशर के मत से केंद्र के स्वामी के साथ या त्रिकोण के स्वामी के साथ केंद्र में बेठनेपर ये योग कारक अर्थात् शुभफलदायक भी हो जाते है। राहु का प्रभाव आकस्मिक होता है।जिसमें समभलने का मौक़ा  नही मिलता।राहु मंगल की युति प्रायः दुर्घटना कारक होती है,ऐसी हीं स्थिति राहु-शनि की युति में होती है।जब सम्पूर्ण दृश्यमान ग्रह राहु-केतु के मध्य स्थित होते है,तो उसे कालसर्प योग कहते है।विंशौत्तरी दशा में राहु के वर्ष 18 ओर केतु के 7 वर्ष  है।राहु का फल-स्वरुप-कार्यक्षेत्र शनि के अनुसार होता है।
केतु का फल-स्वरुप-कार्यक्षेत्र मंगल के अनुसार होता है।